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श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 58: अर्जुनका द्रोणाचार्यके साथ युद्ध और आचार्यका पलायन  »  श्लोक 48-49
 
 
श्लोक  4.58.48-49 
दर्शयन् वीक्षमाणानामस्त्रमुग्रपराक्रम:।
इषुभिस्तूर्णमाकाशं बहुभिश्च समावृणोत्॥ ४८॥
जिघांसन्तं नरव्याघ्रमर्जुनं तिग्मतेजसम्।
आचार्यमुख्य: समरे द्रोण: शस्त्रभृतां वर:।
अर्जुनेन सहाक्रीडच्छरै: संनतपर्वभि:॥ ४९॥
 
 
अनुवाद
वे अत्यन्त पराक्रमी होकर दर्शकों के सामने अपनी अस्त्र-विद्या का प्रदर्शन करते हुए क्षण भर में ही आकाश को बाणों की विशाल भीड़ से ढक देते थे। यद्यपि वे महारथी अर्जुन अपने शत्रु का वध करने के लिए इच्छुक थे, तथापि महाशस्त्रज्ञ द्रोण अर्जुन पर झुके हुए सिरों वाले बाणों से प्रहार करके मानो रणभूमि में उनके साथ खेल रहे थे (वे अर्जुन के प्रति स्नेह रखते थे)।॥ 48-49॥
 
Terribly valiant, He displayed His skill in weapons to the spectators and in an instant covered the sky with a multitude of arrows. Though Arjuna, that great warrior of men, was desirous of killing his opponent, yet Drona, that great master of weapons, was as if playing with Arjuna on the battlefield by striking him with arrows having bent tips (he was feeling affectionately towards Arjuna).॥ 48-49॥
 
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