श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 58: अर्जुनका द्रोणाचार्यके साथ युद्ध और आचार्यका पलायन  »  श्लोक 18-19
 
 
श्लोक  4.58.18-19 
उषिता: स्मो वने वासं प्रतिकर्म चिकीर्षव:।
कोपं नार्हसि न: कर्तुं सदा समरदुर्जय॥ १८॥
अहं तु प्रहृते पूर्वं प्रहरिष्यामि तेऽनघ।
इति मे वर्तते बुद्धिस्तद् भवान् कर्तुमर्हति॥ १९॥
 
 
अनुवाद
आचार्य! आपको युद्ध में पराजित करना अत्यन्त कठिन है। हमने अनेक वर्षों तक वन में रहकर कष्ट सहे हैं। अब हम शत्रुओं से बदला लेने की इच्छा से आये हैं; अतः आप हम पर क्रोध न करें। अनघ! मैं आप पर तभी आक्रमण करूँगा जब आप पहले मुझ पर आक्रमण करेंगे। यह मेरा निश्चय है, अतः आप पहले मुझ पर आक्रमण करें।॥18-19॥
 
‘Acharya! It is very difficult to defeat you in battle. We have lived in the forest for many years and suffered. Now we have come with the desire to take revenge from the enemies; therefore, please do not be angry with us. Anagha! I will attack you only when you attack me first. This is my determination, therefore, you attack me first.'॥ 18-19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)