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mahabharat 4.57.3: वैशम्पायन कहते हैं - हे राजन! धनंजय के वचन सुनकर विराटकुमार उत्तर ने तुरन्त ही चाँदी के समान चमकने वाले और सुवर्ण के आभूषणों से विभूषित श्वेत घोड़ों को हाँक दिया।   |   mahabharat अध्याय 4.57: कृपाचार्य और अर्जुनका युद्ध तथा कौरवपक्षके सैनिकोंद्वारा कृपाचार्यको हटा ले जाना   ।   mahabharat पर्व 4: विराट पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  4.57.3 
वैशम्पायन उवाच
धनंजयवच: श्रुत्वा वैराटिस्त्वरितस्तत:।
हयान् रजतसंकाशान् हेमभाण्डानचोदयत्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं - हे राजन! धनंजय के वचन सुनकर विराटकुमार उत्तर ने तुरन्त ही चाँदी के समान चमकने वाले और सुवर्ण के आभूषणों से विभूषित श्वेत घोड़ों को हाँक दिया।
 
Vaishmpayana says - O King! On hearing Dhananjaya's words, Viratkumar Uttar immediately drove the white horses shining like silver and adorned with golden ornaments.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)