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श्लोक 4.57.28  |
तस्य निर्मुच्यमानस्य कवचात् काय आबभौ।
समये मुच्यमानस्य सर्पस्येव तनुर्यथा॥ २८॥ |
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| अनुवाद |
| कवच से मुक्त होने पर कृपाचार्य का शरीर ऐसा सुन्दर लगने लगा जैसे समय आने पर केंचुली उतारने पर साँप का शरीर सुन्दर हो जाता है ॥28॥ |
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| After being freed from the armour, Kripacharya's body looked as beautiful as a snake's body looks after shedding its skin in due course of time. ॥28॥ |
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