राजन! अर्जुन के ये वचन सुनकर विराटपुत्र उत्तर निर्भय और सावधान हो गया और सव्यसाची धनंजय को युद्ध करने के लिए उस स्थान पर ले गया जहाँ कृपाचार्य खड़े थे।
King! On hearing these words of Arjun, Virat's son Uttar became fearless and cautious and took Savyasachi Dhananjaya to the place where Krupacharya was standing to fight with him. 60.
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि अर्जुनकृपसंग्रामे पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्याय:॥ ५५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें अर्जुन-कृप-संग्रामविषयक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५५॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥