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श्लोक 4.52.d3-d4  |
वैशम्पायन उवाच
अभेद्यं सर्वसैन्यानां व्यूह्य व्यूहं कुरूत्तम:।
वज्रगर्भं व्रीहिमुखमर्धचक्रान्तमण्डलम्॥
तस्य व्यूहस्य पश्चार्धे भीष्मश्चाथोद्यतायुध:।
सौवर्णं तालमुच्छ्रित्य रथे तिष्ठन्नशोभत॥ ) |
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| अनुवाद |
| वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तत्पश्चात कौरवों में श्रेष्ठ भीष्म ने समस्त सेनाओं की एक अभेद्य व्यूह रचना करके उसे वज्रगर्भ, वृहिमुख और अर्धचक्रान्तमण्डल आदि के रूप में खड़ा कर दिया और उसके पीछे भीष्म भी स्वर्ण धातु की ध्वजा फहराते और हाथ में शस्त्र लेकर खड़े हो गये। उस समय वे बहुत शोभा पा रहे थे। |
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| Vaishampayanji says – Janamejaya! Thereafter, Bhishma, the best of the Kurus, created an impenetrable array of all the armies and made it stand in the form of Vajragarbha, Vrihimukh and Ardhachakrantmandal etc. and behind it, Bhishma also stood with the golden metal flag hoisted and weapons in his hands. At that time he was looking great. |
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इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि भीष्मसैन्यव्यूहे द्विपञ्चाशत्तमोऽध्याय:॥ ५२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें भीष्मजीके द्वारा सेनाकी व्यूहरचनाविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५२॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ १/२ श्लोक मिलाकर कुल २७ १/२ श्लोक हैं।) |
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