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mahabharat 4.51.7: जैसे सूर्य की प्रभा और चन्द्रमा की शोभा सदैव विद्यमान रहती है और कभी क्षीण नहीं होती, उसी प्रकार शस्त्रविद्या में भी आपकी निपुणता अक्षुण्ण है ॥7॥   |   mahabharat अध्याय 4.51: भीष्मजीके द्वारा सेनामें शान्ति और एकता बनाये रखनेकी चेष्टा तथा द्रोणाचार्यके द्वारा दुर्योधनकी रक्षाके लिये प्रयत्न   ।   mahabharat पर्व 4: विराट पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 51: भीष्मजीके द्वारा सेनामें शान्ति और एकता बनाये रखनेकी चेष्टा तथा द्रोणाचार्यके द्वारा दुर्योधनकी रक्षाके लिये प्रयत्न  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  4.51.7 
भवतां हि कृतास्त्रत्वं यथाऽऽदित्ये प्रभा तथा।
यथा चन्द्रमसो लक्ष्मी: सर्वथा नापकृष्यते॥ ७॥
 
 
अनुवाद
जैसे सूर्य की प्रभा और चन्द्रमा की शोभा सदैव विद्यमान रहती है और कभी क्षीण नहीं होती, उसी प्रकार शस्त्रविद्या में भी आपकी निपुणता अक्षुण्ण है ॥7॥
 
Just as the radiance of the Sun and the beauty of the Moon are always present and never diminish, in the same way your expertise in the knowledge of weapons is unbroken. ॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)