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mahabharat 4.51.14: अश्वत्थामा ने कहा- पुरुषोत्तम! हमारे न्यायोचित वचनों की निन्दा नहीं करनी चाहिए। आचार्य द्रोण ने पाण्डवों के साथ पूर्व में किए गए अन्यायों का स्मरण करके क्रोधपूर्वक यहाँ अर्जुन के गुणों का वर्णन किया है (भेदभाव उत्पन्न न करने के लिए)। 14॥   |   mahabharat अध्याय 4.51: भीष्मजीके द्वारा सेनामें शान्ति और एकता बनाये रखनेकी चेष्टा तथा द्रोणाचार्यके द्वारा दुर्योधनकी रक्षाके लिये प्रयत्न   ।   mahabharat पर्व 4: विराट पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 51: भीष्मजीके द्वारा सेनामें शान्ति और एकता बनाये रखनेकी चेष्टा तथा द्रोणाचार्यके द्वारा दुर्योधनकी रक्षाके लिये प्रयत्न  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  4.51.14 
अश्वत्थामोवाच
नैव न्याय्यमिदं वाच्यमस्माकं पुरुषर्षभ।
किं तु रोषपरीतेन गुरुणा भाषिता गुणा:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
अश्वत्थामा ने कहा- पुरुषोत्तम! हमारे न्यायोचित वचनों की निन्दा नहीं करनी चाहिए। आचार्य द्रोण ने पाण्डवों के साथ पूर्व में किए गए अन्यायों का स्मरण करके क्रोधपूर्वक यहाँ अर्जुन के गुणों का वर्णन किया है (भेदभाव उत्पन्न न करने के लिए)। 14॥
 
Ashwatthama said – Best man! Our just words should not be criticized. Acharya Drona, remembering the earlier injustices done to the Pandavas, has angrily described the qualities of Arjuna here (not to create discrimination). 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)