श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 51: भीष्मजीके द्वारा सेनामें शान्ति और एकता बनाये रखनेकी चेष्टा तथा द्रोणाचार्यके द्वारा दुर्योधनकी रक्षाके लिये प्रयत्न  » 
 
 
अध्याय 51: भीष्मजीके द्वारा सेनामें शान्ति और एकता बनाये रखनेकी चेष्टा तथा द्रोणाचार्यके द्वारा दुर्योधनकी रक्षाके लिये प्रयत्न
 
श्लोक 1:  भीष्मजी ने कहा- दुर्योधन! अश्वत्थामा सही सोच रहा है. कृपाचार्य का मत भी सही है। कर्ण केवल क्षत्रिय-धर्म की दृष्टि से ही युद्ध करना चाहता है।
 
श्लोक 2:  विद्वान पुरुष को अपने गुरु की निन्दा या अनादर नहीं करना चाहिए। मेरा भी यही मानना ​​है कि देश और काल का विचार करके ही युद्ध करना उचित है।॥2॥
 
श्लोक 3:  यदि किसी मनुष्य के पाँच शत्रु सूर्य के समान तेजस्वी और उस पर आक्रमण करने में समर्थ हों और वे शत्रु बढ़ते जा रहे हों, तो उस अवस्था में विद्वान् पुरुष भी मोहग्रस्त कैसे न हो सकता है? ॥3॥
 
श्लोक 4:  सभी मनुष्य, यहाँ तक कि धर्म को जानने वाले भी, अपने हित के बारे में सोचते समय मोहग्रस्त हो जाते हैं। इसलिए हे राजन, यदि आपको उचित लगे तो मैं इस विषय में आपको अपनी सलाह देता हूँ।
 
श्लोक 5:  कर्ण ने जो कुछ भी तुमसे कहा है, वह तुम्हारा उत्साह और उमंग बढ़ाने के लिए ही कहा है। हे गुरुपुत्र, मुझे क्षमा करो। इस समय एक महान कार्य मेरे सामने है।
 
श्लोक 6:  यह समय आपस में संघर्ष करने का नहीं है; विशेषकर ऐसे समय में जब कुंतीपुत्र अर्जुन युद्ध के लिए तैयार है। पूज्य आचार्य द्रोण और कृपाचार्य को चाहिए कि वे सभी अपराधों को क्षमा कर दें।
 
श्लोक 7:  जैसे सूर्य की प्रभा और चन्द्रमा की शोभा सदैव विद्यमान रहती है और कभी क्षीण नहीं होती, उसी प्रकार शस्त्रविद्या में भी आपकी निपुणता अक्षुण्ण है ॥7॥
 
श्लोक 8:  इस प्रकार तुममें ब्राह्मणत्व और ब्रह्म-अस्त्र दोनों ही प्रतिष्ठित हैं, यद्यपि प्रायः एक व्यक्ति में चारों वेदों का ज्ञान देखा जाता है, और दूसरे में क्षात्रधर्म का।
 
श्लोक 9:  हमने किसी एक व्यक्ति में इन दोनों बातों के विषय में नहीं सुना है। केवल भरतवंश के आचार्य कृपाचार्य, द्रोणाचार्य तथा उनके पुत्र अश्वत्थामा में ही ये दोनों शक्तियाँ (ब्रह्मबल और क्षत्रबल) विद्यमान हैं। इनके अतिरिक्त अन्यत्र कहीं भी इन दोनों बातों का संयोग नहीं है। ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है॥9॥
 
श्लोक 10:  राजन! जमदग्निपुत्र परशुराम के अतिरिक्त वेदान्त, पुराण और प्राचीन इतिहास के ज्ञान में द्रोणाचार्य से श्रेष्ठ कौन हो सकता है?॥10॥
 
श्लोक 11-12:  ब्रह्मास्त्र और वेद - ये दोनों वस्तुएँ गुरुजनों के सान्निध्य के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं भी देखने को नहीं मिलतीं। हे गुरुपुत्र! मुझे क्षमा करें, यह समय हममें फूट डालने का नहीं है। हम सब मिलकर यहाँ आए हुए अर्जुन के साथ युद्ध करेंगे। ॥11-12॥
 
श्लोक 13:  सेना को नष्ट करने वाली सभी समस्याओं में से, बुद्धिमानों ने आंतरिक फूट को सबसे महत्वपूर्ण बताया है। विद्वानों ने इस फूट को महान पाप माना है॥13॥
 
श्लोक 14:  अश्वत्थामा ने कहा- पुरुषोत्तम! हमारे न्यायोचित वचनों की निन्दा नहीं करनी चाहिए। आचार्य द्रोण ने पाण्डवों के साथ पूर्व में किए गए अन्यायों का स्मरण करके क्रोधपूर्वक यहाँ अर्जुन के गुणों का वर्णन किया है (भेदभाव उत्पन्न न करने के लिए)। 14॥
 
श्लोक 15:  शत्रु के भी गुणों को स्वीकार करना चाहिए और गुरु के दोषों को बताने में संकोच नहीं करना चाहिए। गुरु को सब प्रकार से पूर्ण प्रयास करते हुए केवल वही कहना चाहिए जो पुत्र और शिष्य के लिए हितकर हो।॥15॥
 
श्लोक 16:  दुर्योधन बोला - आचार्य ! मुझे क्षमा करें, अब हमें शांति बनाए रखनी चाहिए। यदि गुरु के मन में मतभेद न हो, तभी यह समझा जाएगा कि पहले कही गई बातों का कारण क्रोध ही था।
 
श्लोक 17:  वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! इसके बाद कर्ण, भीष्म और महात्मा कृपाचार्य सहित दुर्योधन ने आचार्य द्रोण से क्षमा मांगी। 17॥
 
श्लोक 18-19:  तब द्रोण बोले, "मैं शांतनुपुत्र भीष्म की पूर्व कही बात से प्रसन्न हूँ। अब हमें ऐसी नीति अपनानी चाहिए कि इस युद्ध में अर्जुन दुर्योधन तक न पहुँच सके। हमें ऐसी नीति बनानी चाहिए कि वह साहस या प्रमाद से भी दुर्योधन पर आक्रमण न कर सके।" 18-19
 
श्लोक 20:  वनवास की अवधि समाप्त होने तक अर्जुन स्वयं को प्रकट नहीं कर सके। यदि वे आज यहाँ आकर अपने गोधन को नहीं खोज पाए, तो वे हमें क्षमा नहीं कर सकते।
 
श्लोक 21:  ऐसी स्थिति में जो भी संभव हो, ऐसी नीति बनानी चाहिए जिससे वे धृतराष्ट्र के पुत्रों पर आक्रमण न कर सकें और कौरव सेनाओं को किसी भी प्रकार पराजित न कर सकें ॥ 21॥
 
श्लोक 22:  इससे पहले दुर्योधन ने भी कहा था कि पांडवों का वनवास पूरा होने में संदेह है। अतः हे गंगापुत्र भीष्म! आप स्वयं सत्य का विचार करके निर्णय करें कि उनका वनवास पूरा हुआ है या नहीं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)