श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 50: अश्वत्थामाके उद्‍गार  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  4.50.9 
तथाधिगम्य वित्तानि को विकत्थेद् विचक्षण:।
निकृत्या वञ्चनायोगैश्चरन् वैतंसिको यथा॥ ९॥
 
 
अनुवाद
जैसे शिकारी छल-कपट से जीविका कमाता है, वैसे ही कौन बुद्धिमान मनुष्य छल-कपट से धन प्राप्त करके अपने पर गर्व करेगा? ॥9॥
 
Just as a hunter earns his living by deceit and fraud, similarly, which wise man, having obtained wealth by deceitful means, will boast of himself? ॥9॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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