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श्लोक 4.50.28  |
युध्यन्तां कामतो योधा नाहं योत्स्ये धनंजयम्।
मत्स्यो ह्यस्माभिरायोध्योयद्यागच्छेद् गवां पदम्॥ २८॥ |
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| अनुवाद |
| अथवा अन्य योद्धा चाहें तो युद्ध कर सकते हैं, किन्तु मैं अर्जुन से युद्ध नहीं करूँगा। हमें मत्स्यराज से युद्ध करना है। यदि वह इस शिविर में आ जाएँ, तो मैं उनसे युद्ध कर सकता हूँ॥ 28॥ |
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| Or if other warriors wish, they can fight, but I will not fight with Arjun. We have to fight with the Matsya King. If he comes to this camp, then I can fight with him.॥ 28॥ |
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इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि उत्तरगोग्रहे द्रौणिवाक्यं नाम पञ्चाशत्तमोऽध्याय:॥ ५०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें उत्तरगोग्रहके समय अश्वत्थामावाक्यविषयक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५०॥
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