श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 50: अश्वत्थामाके उद्‍गार  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  4.50.22 
यथा त्वमकरोर्द्यूतमिन्द्रप्रस्थं यथाऽऽहर:।
यथाऽऽनैषी: सभां कृष्णां तथा युध्यस्व पाण्डवम्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
दुर्योधन! जैसे तूने जुआ खेला था, जैसे तूने इन्द्रप्रस्थ के राज्य का अपहरण किया था और जैसे तूने द्रौपदी को दरबार में घसीटा था, वैसे ही तू पाण्डवपुत्र अर्जुन के साथ युद्ध कर। [जब उन अन्यायों के समय तुझे हमारे सहयोग की आवश्यकता अनुभव नहीं हुई, तो इस युद्ध में भी सहयोग की आशा मत कर।]॥22॥
 
Duryodhan! Just as you played gambling, just as you kidnapped the kingdom of Indraprastha and just as you dragged Draupadi in the court, similarly fight with Arjuna, the son of Pandava. [When you did not feel the need for our cooperation during those injustices, then do not expect cooperation in this war also.]॥ 22॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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