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mahabharat 4.50.2-3: विद्वान पुरुष अनेक युद्ध जीतकर, असंख्य धन प्राप्त करके और शत्रु सेना को परास्त करके भी इस प्रकार व्यर्थ की बातें नहीं करते। अग्नि बिना कुछ कहे ही सब कुछ जलाकर राख कर देती है, सूर्य चुपचाप चमकता है, पृथ्वी शांत रहकर समस्त चराचर जगत् का पालन करती है (कोई भी उसके पराक्रम की प्रशंसा नहीं करता)।॥2-3॥   |   mahabharat अध्याय 4.50: अश्वत्थामाके उद्‍गार   ।   mahabharat पर्व 4: विराट पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 50: अश्वत्थामाके उद्‍गार  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  4.50.2-3 
संग्रामांश्च बहून् जित्वा लब्ध्वा च विपुलं धनम्।
विजित्य च परां सेनां नाहु: किंचन पौरुषम्॥ २॥
दहत्यग्निरवाक्यस्तु तूष्णीं भाति दिवाकर:।
तूष्णीं धारयते लोकान् वसुधा सचराचरान्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
विद्वान पुरुष अनेक युद्ध जीतकर, असंख्य धन प्राप्त करके और शत्रु सेना को परास्त करके भी इस प्रकार व्यर्थ की बातें नहीं करते। अग्नि बिना कुछ कहे ही सब कुछ जलाकर राख कर देती है, सूर्य चुपचाप चमकता है, पृथ्वी शांत रहकर समस्त चराचर जगत् का पालन करती है (कोई भी उसके पराक्रम की प्रशंसा नहीं करता)।॥2-3॥
 
Learned men do not indulge in useless talk like this even after winning many battles, acquiring innumerable wealth and defeating the enemy's army. Fire burns everything to ashes without saying anything, the Sun shines silently, the Earth sustains all the living and non-living worlds by remaining quiet (none of them praises his prowess).॥2-3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)