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श्लोक 4.5.28  |
वैशम्पायन उवाच
अथान्वशासन्नकुलं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर:।
आरुह्येमां शमीं वीर धनूंष्येतानि निक्षिप॥ २८॥ |
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| अनुवाद |
| वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन! तत्पश्चात कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर ने नकुल को आदेश दिया- 'वीर! तुम इस दीपक पर चढ़ जाओ और धनुष आदि इन अस्त्रों को रख लो॥28॥ |
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| Vaishampayanji says- Rajan! Thereafter, Kuntinandan Yudhishthir ordered Nakula - 'Brave! You climb on this lamp and keep these weapons like bow etc. 28॥ |
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