श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 5: पाण्डवोंका विराटनगरके समीप पहुँचकर श्मशानमें एक शमीवृक्षपर अपने अस्त्र-शस्त्र रखना  »  श्लोक 24-25
 
 
श्लोक  4.5.24-25 
अजयत् पश्चिमामाशां धनुषा येन पाण्डव:।
माद्रीपुत्रो महाबाहुस्ताम्रास्यो मितभाषिता॥ २४॥
तस्य मौर्वीमपाकर्षच्छूर: संक्रन्दनो युधि।
कुले नास्ति समो रूपे यस्येति नकुल: स्मृत:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
जिनका मुख ताँबे के समान लाल था, जो बहुत कम बोलते थे, वे महाबाहु माद्रीनाथ के पुत्र नकुल, जिन्होंने दिग्विजय के समय उस धनुष के द्वारा पश्चिम दिशा को जीत लिया था, जो सम्पूर्ण कुरुवंश में उनके समान सुन्दर कोई न होने के कारण नकुल कहलाते थे, जो युद्ध में शत्रुओं को रुला देने वाले पराक्रमी योद्धा थे, उन वीर नकुल ने भी पूर्वोक्त धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई थी॥ 24-25॥
 
Whose face was as red as copper, who spoke very little, that mighty-armed Nakula, son of Madrinath, had conquered the west with the help of that bow during his Digvijaya, who was called Nakula because there was no one as handsome as him in the entire Kuru clan, who was a valiant warrior who would make his enemies cry in war, that brave Nakula also strung the aforesaid bow.॥ 24-25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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