श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 5: पाण्डवोंका विराटनगरके समीप पहुँचकर श्मशानमें एक शमीवृक्षपर अपने अस्त्र-शस्त्र रखना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  4.5.17 
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा स राजानं धर्मराजं युधिष्ठिरम्।
प्रचक्रमे निधानाय शस्त्राणां भरतर्षभ॥ १७॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! धर्मराज युधिष्ठिर से ऐसा कहकर अर्जुन ने अस्त्रों को वहीं रखने का प्रयत्न किया॥17॥
 
Vaishmpayana says: Janamejaya! Having said this to Dharmaraja King Yudhishthira, Arjuna began trying to keep the weapons there.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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