श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 5: पाण्डवोंका विराटनगरके समीप पहुँचकर श्मशानमें एक शमीवृक्षपर अपने अस्त्र-शस्त्र रखना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  4.5.14 
न चापि विद्यते कश्चिन्मनुष्य इति मे मति:।
योऽस्मान् निदधतो द्रष्टा भवेच्छस्त्राणि पाण्डवा:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
पाण्डवों! मेरा विश्वास है कि यहाँ कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो हमें यहाँ अपने अस्त्र-शस्त्र रखते हुए देख सके ॥14॥
 
Pāṇḍvas! I believe that there is no person here who can see us keeping our weapons here. ॥ 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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