श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 48: कर्णकी आत्मप्रशंसापूर्ण अहंकारोक्ति  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  4.48.17 
सुतेजनै रुक्मपुङ्खै: सुधौतैर्नतपर्वभि:।
आचितं पश्य कौन्तेयं कर्णिकारैरिवाचलम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
जैसे पर्वत कनेर के फूलों से सुशोभित होता है, उसी प्रकार कुन्तीपुत्र अर्जुन को मेरे सुनहरे पंखों और चमकीले अग्रभाग वाले तीखे बाणों से आच्छादित होते हुए देखो॥17॥
 
Just as a mountain is adorned with oleander flowers, similarly see Kunti's son Arjuna being covered with my sharp arrows having golden feathers and bright tips. ॥17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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