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श्लोक 4.47.14  |
तेषामेव महावीर्य: कश्चिदेष पुर:सर:।
अस्मान् जेतुमिहायातो मत्स्यो वापि स्वयं भवेत्॥ १४॥ |
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| अनुवाद |
| उन सैनिकों में कोई अत्यन्त पराक्रमी योद्धा हमें परास्त करने के लिए सेनापति बनकर आया है। यह भी सम्भव है कि वह स्वयं मत्स्यराज ही हो॥14॥ |
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| ‘Among those soldiers, some very valiant warrior has come as a leader to defeat us. It is also possible that he is Matsyaraj himself.॥ 14॥ |
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