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श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 46: उत्तरके रथपर अर्जुनको ध्वजकी प्राप्ति, अर्जुनका शंखनाद और द्रोणाचार्यका कौरवोंसे उत्पात-सूचक अपशकुनोंका वर्णन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  4.46.5 
सपताकं विचित्राङ्गं सोपासङ्गं महाबलम्।
खात् पपात रथे तूर्णं दिव्यरूपं मनोरमम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् वह अत्यन्त शक्तिशाली दिव्य सुन्दर ध्वजा, अपने ध्वजा तथा विचित्र अंगों सहित, तुरन्त ही आकाश से अर्जुन के रथ पर गिर पड़ी॥5॥
 
Thereafter, that very powerful divinely beautiful flag with its ensign and strange limbs and appendages immediately fell from the sky on Arjuna's chariot. 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)