श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 46: उत्तरके रथपर अर्जुनको ध्वजकी प्राप्ति, अर्जुनका शंखनाद और द्रोणाचार्यका कौरवोंसे उत्पात-सूचक अपशकुनोंका वर्णन  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  4.46.31 
विशेषत इहास्माकं निमित्तानि विनाशने।
उल्काभिश्च प्रदीप्ताभिर्बाध्यते पृतना तव।
वाहनान्यप्रहृष्टानि रुदन्तीव विशाम्पते॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
राजा दुर्योधन! यहाँ तो हमारे लिए विनाशसूचक अशुभ संकेत हो रहे हैं। आपकी सेना पर जलते हुए उल्कापिंड गिर रहे हैं और उसे पीड़ा पहुँचा रहे हैं। आपके वाहन (हाथी और घोड़े) दुखी और रोते हुए प्रतीत हो रहे हैं॥ 31॥
 
King Duryodhana! Especially here, bad omens indicating destruction are happening for us. Burning meteors keep falling on your army and causing it pain. Your vehicles (elephants and horses) look unhappy and as if crying.॥ 31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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