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mahabharat 4.46.21: वैशम्पायन कहते हैं - जनमेजय! तब अर्जुन ने इतने ज़ोर से शंख बजाया कि मानो वह पर्वतों, पर्वत-कंदराओं, समस्त दिशाओं और बड़ी-बड़ी चट्टानों को भी भेद देगा। इस बार भी उत्तरा रथ के भीतर छिपकर बैठ गया।   |   mahabharat अध्याय 4.46: उत्तरके रथपर अर्जुनको ध्वजकी प्राप्ति, अर्जुनका शंखनाद और द्रोणाचार्यका कौरवोंसे उत्पात-सूचक अपशकुनोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 4: विराट पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 46: उत्तरके रथपर अर्जुनको ध्वजकी प्राप्ति, अर्जुनका शंखनाद और द्रोणाचार्यका कौरवोंसे उत्पात-सूचक अपशकुनोंका वर्णन  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  4.46.21 
वैशम्पायन उवाच
तत: शङ्खमुपाध्मासीद् दारयन्निव पर्वतान्।
गुहा गिरीणां च तदा दिश: शैलांस्तथैव च।
उत्तरश्चापि संलीनो रथोपस्थ उपाविशत्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं - जनमेजय! तब अर्जुन ने इतने ज़ोर से शंख बजाया कि मानो वह पर्वतों, पर्वत-कंदराओं, समस्त दिशाओं और बड़ी-बड़ी चट्टानों को भी भेद देगा। इस बार भी उत्तरा रथ के भीतर छिपकर बैठ गया।
 
Vaishampayana says - Janamejaya! Then Arjuna blew his conch with such force that it seemed as if it would pierce the mountains, mountain caves, all directions and even the biggest rocks. This time too, Uttara hid himself inside the chariot and sat down.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)