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mahabharat 4.46.16-17: धनुष की ऐसी टंकार मैंने पहले कभी नहीं सुनी। शंख की भयानक ध्वनि, धनुष की अनोखी टंकार, ध्वजा में निवास करने वाले मानवेतर प्राणियों की तीव्र ध्वनि तथा रथ की भारी घरघराहट से मेरा हृदय अत्यंत व्याकुल हो गया है।   |   mahabharat अध्याय 4.46: उत्तरके रथपर अर्जुनको ध्वजकी प्राप्ति, अर्जुनका शंखनाद और द्रोणाचार्यका कौरवोंसे उत्पात-सूचक अपशकुनोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 4: विराट पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 46: उत्तरके रथपर अर्जुनको ध्वजकी प्राप्ति, अर्जुनका शंखनाद और द्रोणाचार्यका कौरवोंसे उत्पात-सूचक अपशकुनोंका वर्णन  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  4.46.16-17 
धनुषश्चैव निर्घोष: श्रुतपूर्वो न मे क्वचित्।
अस्य शङ्खस्य शब्देन धनुषो नि:स्वनेन च॥ १६॥
अमानुषाणां शब्देन भूतानां ध्वजवासिनाम्।
रथस्य च निनादेन मनो मुह्यति मे भृशम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
धनुष की ऐसी टंकार मैंने पहले कभी नहीं सुनी। शंख की भयानक ध्वनि, धनुष की अनोखी टंकार, ध्वजा में निवास करने वाले मानवेतर प्राणियों की तीव्र ध्वनि तथा रथ की भारी घरघराहट से मेरा हृदय अत्यंत व्याकुल हो गया है।
 
I have never heard such a twang of a bow before. My heart has become very restless due to the terrifying sound of the conch, the unique twang of the bow, the loud noises of the non-human creatures residing in the flag and the heavy rattling of the chariot.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)