श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 41: उत्तरका अर्जुनके आदेशके अनुसार शमीवृक्षसे पाण्डवोंके दिव्य धनुष आदि उतारना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  4.41.2 
नैवंविधं मया युक्तमालब्धुं क्षत्रयोनिना।
महता राजपुत्रेण मन्त्रयज्ञविदा सता॥ २॥
 
 
अनुवाद
प्रथम तो मैं क्षत्रिय हूँ, दूसरे मैं महाप्रतापी हूँ, तीसरे मैं पुण्यात्मा हूँ, मंत्र और यज्ञों का ज्ञाता हूँ, अतः ऐसी अपवित्र वस्तु का स्पर्श करना मेरे लिए अनुचित है॥ 2॥
 
Firstly I am a Kshatriya, secondly a great prince and thirdly I am a virtuous person and have knowledge of mantras and yagyas. Therefore it is inappropriate for me to touch such an unholy object.॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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