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श्लोक 4.39.17  |
वैशम्पायन उवाच
तस्मिन् ब्रुवति तद् वाक्यं धार्तराष्ट्रे परंतप।
भीष्मो द्रोण: कृपो द्रौणि: पौरुषं तदपूजयन्॥ १७॥ |
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| अनुवाद |
| वैशम्पायन कहते हैं:- परंतप! जब धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योधन ने यह कहा तो भीष्म, द्रोण, कृपा तथा अश्वत्थामा ने उसकी वीरता की बहुत प्रशंसा की। |
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| Vaishmpayana says: - Parantapa! When Duryodhana, the son of Dhritarashtra said this, Bhishma, Drona, Kripa and Ashvatthama greatly praised his valour. |
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इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि उत्तरगोग्रहे अर्जुनप्रशंसायामेकोनचत्वारिंशोऽध्याय:॥ ३९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें उत्तर दिशाकी ओरसे गौओंके अपहरणके प्रसंगमें अर्जुनकी प्रशंसाविषयक उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३९॥
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