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श्लोक 4.33.61  |
युधिष्ठिर उवाच
मुञ्च मुञ्चाधमाचारं प्रमाणं यदि ते वयम्।
दासभावं गतो ह्येष विराटस्य महीपते:।
अदासो गच्छ मुक्तोऽसि मैवं कार्षी: कदाचन॥ ६१॥ |
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| अनुवाद |
| तब युधिष्ठिर ने कहा, "भैया! यदि आप मेरी बात से सहमत हैं, तो इस पापी को जाने दीजिए। यह तो राजा विराट का दास बन चुका है।" (इसके बाद उन्होंने सुशर्मा से कहा, "अब तुम दास नहीं रहे। चले जाओ, तुम्हें जाने दिया गया है। फिर कभी ऐसा काम मत करना।" 61. |
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| Then Yudhishthira said, "Brother! If you agree with me, then let this sinner go. He has already become the slave of King Virat. (After this he said to Susharma, "You are no longer a slave. Go away, you have been let go. Never do such a thing again." 61. |
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इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि दक्षिणगोग्रहे त्रयस्त्रिंशोऽध्याय:॥ ३३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें दक्षिणदिशाकी गौओंका अपहरण करते समय सुशर्माके निग्रहसे सम्बन्ध रखनेवाला तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३३॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ६३ श्लोक हैं।) |
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