श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 33:  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  4.33.44 
अनेन वीर्येण कथं गास्त्वं प्रार्थयसे बलात्।
कथं चानुचरांस्त्यक्त्वा शत्रुमध्ये विषीदसि॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
इसी पराक्रम का भरोसा करके तुमने विराट की गौओं को बलपूर्वक कैसे हर लेना चाहा? शत्रुओं के बीच में अपने सेवकों को छोड़कर तुम क्यों भाग रहे हो और दुःखी हो रहे हो?॥44॥
 
Relying on this valour, how did you wish to take away Virata's cows by force? Why do you run away and feel sad, leaving your servants in the midst of the enemies?'॥ 44॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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