श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 33:  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  4.33.17 
वैशम्पायन उवाच
तं मत्तमिव मातङ्गं वीक्षमाणं वनस्पतिम्।
अब्रवीद् भ्रातरं वीरं धर्मराजो युधिष्ठिर:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- हे राजन! ऐसा कहकर भीमसेन मतवाले हाथी की भाँति उस वृक्ष की ओर देखने लगे। तब धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने वीर भाई से कहा-॥17॥
 
Vaishampayana says- O King! Saying this, Bhimsena started looking at that tree like a drunken elephant. Then Dharmaraja Yudhishthira said to his brave brother-॥17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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