| श्री महाभारत » पर्व 4: विराट पर्व » अध्याय 33: » श्लोक 1 |
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| | | | श्लोक 4.33.1  | वैशम्पायन उवाच
तमसाभिप्लुते लोके रजसा चैव भारत।
अतिष्ठन् वै मुहूर्तं तु व्यूढानीका: प्रहारिण:॥ १॥ | | | | | | अनुवाद | | वैशम्पायन कहते हैं, "भरत! उस समय [सूर्य अस्त हो चुका था और रात्रि भी हो चुकी थी, अतः] सब लोग धूल से ही नहीं, अपितु अंधकार से भी आच्छादित थे; अतएव आक्रमणकारी सैनिक सेना की व्यूह रचना करके कुछ समय के लिए युद्ध रोककर वहीं खड़े हो गए॥1॥ | | | | Vaishmpayana says, "Bharata! At that time [the sun had set and night had set, so] everyone was not only covered with dust, but also with darkness; therefore, the attacking soldiers formed an army formation and stopped fighting for some time and stood there. ॥1॥ | | ✨ ai-generated | | |
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