|
| |
| |
श्लोक 4.32.30  |
तत: सैन्यं महाराज मत्स्यराजसुशर्मणो:।
नाभ्यजानात् तदान्योन्यं सैन्येन रजसाऽऽवृतम्॥ ३०॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| महाराज! तत्पश्चात् सैनिकों के पैरों से इतनी धूल उड़ी कि मत्स्यनरेश और सुशर्मा दोनों की सेनाएँ उससे ढक गईं और उन्हें यह भी पता नहीं चला कि कौन कहाँ क्या कर रहा है। |
| |
| Maharaj! Thereafter so much dust flew from the feet of the soldiers that the armies of both Matsyanaresh and Susharma were covered by it and they could not even know who was doing what where. |
| |
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि दक्षिणगोग्रहे विराटसुशर्मयुद्धे द्वात्रिंशोऽध्याय:॥ ३२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें दक्षिणदिशाकी गौओंके अपहरणके समय होनेवाले विराट और सुशर्माके युद्धके विषयमें बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३२॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल ३४ श्लोक हैं।) |
| |
| ✨ ai-generated |
| |
|