| श्री महाभारत » पर्व 4: विराट पर्व » अध्याय 3: नकुल, सहदेव तथा द्रौपदीद्वारा अपने-अपने भावी कर्तव्योंका दिग्दर्शन » श्लोक d1-d3 |
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| | | | श्लोक 4.3.d1-d3  | (अरोगा बहुला: पुष्टा: क्षीरवत्यो बहुप्रजा:।
निष्पन्नसत्त्वा: सुभृता व्यपेतज्वरकिल्बिषा:॥
नष्टचोरभया नित्यं व्याधिव्याघ्रविवर्जिता:।
गावश्च सुसुखा राजन् निरुद्विग्ना निरामया:॥
भविष्यन्ति मया गुप्ता विराटपशवो नृप॥ ) | | | | | | अनुवाद | | हे राजन! मेरे द्वारा रक्षित होकर राजा विराट के गौवंश स्वस्थ, बहुसंख्यक, निरोगी, दूध देने वाले, बहुत-सी सन्तान वाले, सत्वगुण से युक्त, भली-भाँति पालन-पोषण के कारण रोग-पाप से मुक्त, चोरों के भय से मुक्त तथा रोग और व्याघ्र आदि के भय से सदैव सुरक्षित रहेंगे। महाराज! वे निश्चय ही चिन्ता से मुक्त, सुखी और स्वस्थ रहेंगे। | | | | O King! By being protected by me, the cattle and cows of King Virat will be healthy, numerous, healthy, milk producing, having many offspring, full of goodness, free from the sin of disease due to being well taken care of, free from the fear of thieves and always protected from the fear of diseases and tigers etc. Maharaj! They will definitely be free from anxiety, happy and healthy. | | ✨ ai-generated | | |
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