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श्लोक 4.3.23  |
यथा न दुर्हृद: पापा भवन्ति सुखिन: पुन:।
कुर्यास्तत् त्वं हि कल्याणि लक्षयेयुर्न ते तथा॥ २३॥ |
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| अनुवाद |
| कल्याणी! वहाँ ऐसा आचरण करो कि उन पापी शत्रुओं को फिर कभी सुखी होने का अवसर न मिले; वे तुम्हें किसी भी प्रकार से पहचान न सकें॥ 23॥ |
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| Kalyani! Behave there in such a way that those sinful enemies do not get a chance to be happy again; they should not be able to recognize you in any way.॥ 23॥ |
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इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि युधिष्ठिरादिमन्त्रणे तृतीयोऽध्याय:॥ ३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें युधिष्ठिर आदिकी परस्पर
मन्त्रणाविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ॥ ३॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/२ श्लोक मिलाकर कुल २५ १/२ श्लोक हैं।) |
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