श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 29: कृपाचार्यकी सम्मति और दुर्योधनका निश्चय  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  4.29.4 
नावज्ञेयो रिपुस्तात प्राकृतोऽपि बुभूषता।
किं पुन: पाण्डवास्तात सर्वास्त्रकुशला रणे॥ ४॥
 
 
अनुवाद
'पिताजी! सम्राट बनने की इच्छा रखने वाले को साधारण शत्रु की भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। फिर युद्ध में समस्त अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग करने में कुशल पाण्डवों का क्या होगा?॥4॥
 
‘Father! One who aspires to be an emperor should not disregard even an ordinary enemy. Then what about the Pandavas who are skilled in using all the weapons in war?॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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