श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 28: युधिष्ठिरकी महिमा कहते हुए भीष्मकी पाण्डवोंके अन्वेषणके विषयमें सम्मति  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  4.28.33 
एवमेतत् तु संचिन्त्य यत्कृते मन्यसे हितम्।
तत् क्षिप्रं कुरु कौरव्य यद्येवं श्रद्दधासि मे॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
कुरुनन्दन! यदि तुम्हें मेरे वचनों पर विश्वास है, तो इस प्रकार विचार करके जो कुछ तुम्हें हितकर लगे, उसे शीघ्र ही करो।॥ 33॥
 
Kurunandan! If you have faith in my words, then after thinking in this manner, do whatever you think will be beneficial for you, quickly.'॥ 33॥
 
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि चारप्रत्याचारे भीष्मवाक्ये अष्टाविंशोऽध्याय:॥ २८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें गुप्तचर भेजनेके विषयमें भीष्मवचनसम्बन्धी अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २८॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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