श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 28: युधिष्ठिरकी महिमा कहते हुए भीष्मकी पाण्डवोंके अन्वेषणके विषयमें सम्मति  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  4.28.17 
नासूयको न चापीर्षुर्नाभिमानी न मत्सरी।
भविष्यति जनस्तत्र स्वयं धर्ममनुव्रत:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
वहाँ न कोई दोषदर्शी होगा, न ईर्ष्यालु होगा, न कोई अभिमानी होगा, न ईर्ष्यालु होगा, वहाँ सभी लोग स्वतः ही धर्म में रत रहेंगे॥17॥
 
‘There no one will be a fault-finder or a jealous person. No one will be proud or jealous. Everyone there will be devoted to Dharma on their own.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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