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श्लोक 4.28.11  |
न त्वियं मादृशैर्नीतिस्तस्य वाच्या कथंचन।
सा त्वियं साधु वक्तव्या न त्वनीति: कथंचन॥ ११॥ |
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| अनुवाद |
| मेरे जैसे मनुष्यों को युधिष्ठिर की नीति की कभी आलोचना नहीं करनी चाहिए। उसे उत्तम नीति ही कहना चाहिए, उसे किसी भी प्रकार से अनीति कहना उचित नहीं है।॥11॥ |
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| ‘Men like me should never criticise the policy of Yudhishthira. It should be called a good policy only, it is not right to call it unethical in any way.॥ 11॥ |
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