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श्लोक 4.28.10  |
यत् तु शक्यमिहास्माभिस्तान् वै संचिन्त्य पाण्डवान्।
बुद्धॺा प्रयुक्तं न द्रोहात् प्रवक्ष्यामि निबोध तत्॥ १०॥ |
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| अनुवाद |
| पाण्डवों के विषय में गहन विचार करने पर मुझे जो एकमात्र उपाय उचित प्रतीत हुआ है, वही हम यहाँ अपना सकते हैं। मैं यह बात द्रोण के कारण नहीं, अपितु तुम्हारे हित के लिए कह रहा हूँ; ध्यानपूर्वक सुनो॥10॥ |
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| The only solution that I have found to be reasonable after thinking deeply about the Pandavas is the one we can adopt here. I am telling you this not because of Drona but for your own good; listen carefully.॥ 10॥ |
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