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श्लोक 4.24.d3-d4  |
वैशम्पायन उवाच
तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा कैकेयी दु:खमोहिता।
उवाच द्रौपदीमार्ता भ्रातृव्यसनकर्शिता॥
वस भद्रे यथेष्टं त्वं त्वामहं शरणं गता।
त्रायस्व मम भर्तारं पुत्रांश्चैव विशेषत:॥ ) |
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| अनुवाद |
| वैशम्पायनजी कहते हैं- हे राजन! सैरन्ध्री की यह बात सुनकर केकय की राजकुमारी सुदेष्णा ने अपने भाई के शोक से पीड़ित होकर दुःख से आकुल होकर द्रौपदी से दुःखी स्वर में कहा- 'भद्र! जब तक आपकी इच्छा हो, तब तक आप यहीं रहें; किन्तु विशेष रूप से मेरे पति और पुत्रों की रक्षा करें। इसी हेतु मैं आपकी शरण में आई हूँ।' |
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| Vaishampayana says- O King! Hearing this from Sairandhri, the princess of Kekaya, Sudeshna, suffering from the grief of her brother and overwhelmed with sorrow, said to Draupadi in a sad tone- 'Bhadra! Stay here as long as you wish; but especially protect my husband and sons. For this, I have come to your refuge.' |
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इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि कीचकवधपर्वणि कीचकदाहे चतुर्विंशोऽध्याय:॥ २४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत कीचकवधपर्वमें कीचकोंके दाह-संस्कारविषयक
चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २४॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल ३४ श्लोक हैं।) |
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