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श्लोक 4.2.32  |
एतेन विधिना छन्न: कृतकेन यथानल:।
विहरिष्यामि राजेन्द्र विराटभवने सुखम्॥ ३२॥ |
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| अनुवाद |
| हे राजन, मैं राख में छिपी हुई अग्नि की भाँति कृत्रिम वेश धारण करके विराट के महल में सुखपूर्वक निवास करूँगी। |
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| King, thus concealing myself in artificial attire like a fire hidden in ashes, I shall reside happily in Virata's palace. |
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इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि युधिष्ठिरादिमन्त्रणे द्वितीयोऽध्याय:॥ २॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें युधिष्ठिर आदिकी मन्त्रणाविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ॥ २॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३३ श्लोक हैं।) |
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