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mahabharat 4.18.d7: तत्पश्चात् बारहवें वर्ष के अन्त में मैं जंगली फल-मूल खाता हुआ विराटनगर में आया और सुदेष्णा का दास बन गया। आज मैं सत्य धर्म के मार्ग पर स्थित होकर दूसरी स्त्री की सेवा करता हूँ।   |   mahabharat अध्याय 4.18: द्रौपदीका भीमसेनके प्रति अपने दु:खके उद्‍गार प्रकट करना   ।   mahabharat पर्व 4: विराट पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 18: द्रौपदीका भीमसेनके प्रति अपने दु:खके उद्‍गार प्रकट करना  »  श्लोक d7
 
 
श्लोक  4.18.d7 
ततोऽहं द्वादशे वर्षे वन्यमूलफलाशना।
इदं पुरमनुप्राप्ता सुदेष्णापरिचारिका॥
परस्त्रियमुपातिष्ठे सत्यधर्मपथस्थिता।
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् बारहवें वर्ष के अन्त में मैं जंगली फल-मूल खाता हुआ विराटनगर में आया और सुदेष्णा का दास बन गया। आज मैं सत्य धर्म के मार्ग पर स्थित होकर दूसरी स्त्री की सेवा करता हूँ।
 
Thereafter, at the end of the twelfth year, I came to Viratnagar, eating wild fruits and roots, and became the servant of Sudeshna. Today, being established in the path of true religion, I serve another woman.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)