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mahabharat 4.18.25: वही युधिष्ठिर आज मत्स्यराज की सेवा कर रहे हैं और दासत्वरूपी नरक में फँसे हुए हैं। वे राजा को दरबार में जुआ खिलवाते हैं और अपना परिचय कंक के रूप में देते हैं॥ 25॥   |   mahabharat अध्याय 4.18: द्रौपदीका भीमसेनके प्रति अपने दु:खके उद्‍गार प्रकट करना   ।   mahabharat पर्व 4: विराट पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 18: द्रौपदीका भीमसेनके प्रति अपने दु:खके उद्‍गार प्रकट करना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  4.18.25 
स एष निरयं प्राप्तो मत्स्यस्य परिचारक:।
सभायां देविता राज्ञ: कङ्को ब्रूते युधिष्ठिर:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
वही युधिष्ठिर आज मत्स्यराज की सेवा कर रहे हैं और दासत्वरूपी नरक में फँसे हुए हैं। वे राजा को दरबार में जुआ खिलवाते हैं और अपना परिचय कंक के रूप में देते हैं॥ 25॥
 
The same Yudhishthira is today serving the Matsya king and is trapped in the hell of slavery. He makes the king gamble in the court and introduces himself as Kanka.॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)