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mahabharat 4.16.d68-d69: देवी द्रौपदी तेजस्विता की प्रतिमूर्ति थीं। वे धर्म की ज्ञाता और सत्यनिष्ठ थीं। यह संभव नहीं कि उनके जैसी तेजस्विता से परिपूर्ण नारी अपने केशों को पकड़े जाने पर असहाय की भाँति चुपचाप सहन कर लेतीं। यदि वे इसे सहन करतीं, तो इसका कोई छोटा-मोटा कारण होता। साधुशिरोमणि! मैं वह कारण सुनना चाहता हूँ। कृष्ण के कष्ट सुनकर मेरा हृदय अत्यंत व्यथित हो गया है।   |   mahabharat अध्याय 4.16: कीचकद्वारा द्रौपदीका अपमान   ।   mahabharat पर्व 4: विराट पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  4.16.d68-d69 
तेजोराशिरियं देवी धर्मज्ञा सत्यवादिनी।
केशपक्षे परामृष्टा मर्षयिष्यत्यशक्तवत्॥
नैतत् कारणमल्पं हि श्रोतुकामोऽस्मि सत्तम।
कृष्णायास्तु परिक्लेशान्मनो मे दूयते भृशम्॥
 
 
अनुवाद
देवी द्रौपदी तेजस्विता की प्रतिमूर्ति थीं। वे धर्म की ज्ञाता और सत्यनिष्ठ थीं। यह संभव नहीं कि उनके जैसी तेजस्विता से परिपूर्ण नारी अपने केशों को पकड़े जाने पर असहाय की भाँति चुपचाप सहन कर लेतीं। यदि वे इसे सहन करतीं, तो इसका कोई छोटा-मोटा कारण होता। साधुशिरोमणि! मैं वह कारण सुनना चाहता हूँ। कृष्ण के कष्ट सुनकर मेरा हृदय अत्यंत व्यथित हो गया है।
 
Goddess Draupadi was the epitome of brilliance. She was a knower of Dharma and truthful. It is not possible that a brilliance-filled woman like her would tolerate it silently like a helpless person when her hair was grabbed. If she tolerated it, there would be no small reason for it. Sadhushiromane! I want to hear that reason. My heart is very distressed after hearing about Krishna's suffering.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)