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mahabharat 4.16.6: द्रौपदी बोली, "अरे पापी! यदि आज तक मैंने कभी अभिमान के कारण भी अपने पतियों के विरुद्ध कार्य नहीं किया, तो इस सत्य के प्रभाव से मैं देखूँगी कि तू शत्रुओं के वश में होकर पृथ्वी पर घसीटा जा रहा है।"   |   mahabharat अध्याय 4.16: कीचकद्वारा द्रौपदीका अपमान   ।   mahabharat पर्व 4: विराट पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 16: कीचकद्वारा द्रौपदीका अपमान  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  4.16.6 
द्रौपद्युवाच
यथैवाहं नाभिचरे कदाचित्
पतीन् मदाद् वै मनसापि जातु।
तेनैव सत्येन वशीकृतं त्वां
द्रष्टास्मि पापं परिकृष्यमाणम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
द्रौपदी बोली, "अरे पापी! यदि आज तक मैंने कभी अभिमान के कारण भी अपने पतियों के विरुद्ध कार्य नहीं किया, तो इस सत्य के प्रभाव से मैं देखूँगी कि तू शत्रुओं के वश में होकर पृथ्वी पर घसीटा जा रहा है।"
 
Draupadi said, "Oh sinner! If till today I have never acted against my husbands even out of pride, then due to the effect of this truth I will see that you are being dragged on the earth under the control of the enemy."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)