श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 15: रानी सुदेष्णाका द्रौपदीको कीचकके घर भेजना  »  श्लोक d20
 
 
श्लोक  4.15.d20 
एतत् तु मे दु:खतरं येनाहं भ्रातृसौहृदात्।
विदितार्था करिष्यामि तुष्टो भव कुलक्षयात्॥ )
 
 
अनुवाद
मेरे लिए सबसे बड़ा दुःख तो यही है कि मैं सब परिणाम जानते हुए भी भाईचारे के स्नेहवश आपकी आज्ञा का पालन करूँगा। आपको तो अपने कुल का नाश करके ही संतोष करना चाहिए।'
 
The greatest sorrow for me is that I will obey your orders out of brotherly affection even after understanding all the consequences. You should be satisfied after destroying your clan.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)