vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 4: विराट पर्व
»
अध्याय 14: कीचकका द्रौपदीपर आसक्त हो उससे प्रणययाचना करना और द्रौपदीका उसे फटकारना
»
श्लोक d8
श्लोक
4.14.d8
यो मामज्ञाय कामार्त: अबद्धानि प्रभाषसे।
अशक्तस्तु पुमाञ्छैलं न लङ्घयितुमर्हति॥
अनुवाद
तुम मुझे नहीं जानते, इसीलिए काम-वासना में बहकी-बहकी बातें कर रहे हो। लेकिन असमर्थ मनुष्य चाहे कितना भी प्रयत्न कर ले, वह पर्वत को पार नहीं कर सकता।
You do not know me, that is why you are talking nonsense in lust. But no matter how much an incapable man tries, he cannot cross the mountain.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×