Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 4.14.52: कीचक! यदि तू उन गन्धर्वों की प्रियतमा से ऐसी अनुचित याचना करके पृथ्वी या आकाश में भाग भी जाए, तो भी तुझे कोई आश्रय देने वाला नहीं मिलेगा। (तू इतना कामातुर हो गया है कि) तुझे वह शुभ दृष्टि - वह बुद्धि, जो तेरा भला चाहती है - प्राप्त नहीं होती, जिससे तेरे प्राणों की रक्षा हो सके॥ 52॥ | mahabharat अध्याय 4.14: कीचकका द्रौपदीपर आसक्त हो उससे प्रणययाचना करना और द्रौपदीका उसे फटकारना । mahabharat पर्व 4: विराट पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
तेषां प्रियां प्रार्थयतो न ते भुवि
गत्वा दिवं वा शरणं भविष्यति।
न वर्तते कीचक ते दृशा शुभं
या तेन संजीवनमर्थयेत सा॥ ५२॥
अनुवाद
कीचक! यदि तू उन गन्धर्वों की प्रियतमा से ऐसी अनुचित याचना करके पृथ्वी या आकाश में भाग भी जाए, तो भी तुझे कोई आश्रय देने वाला नहीं मिलेगा। (तू इतना कामातुर हो गया है कि) तुझे वह शुभ दृष्टि - वह बुद्धि, जो तेरा भला चाहती है - प्राप्त नहीं होती, जिससे तेरे प्राणों की रक्षा हो सके॥ 52॥
Keechak! Even if you make such an inappropriate request to the beloved of those Gandharvas and run away to the earth or the sky, you will not find anyone to give you shelter. (You have become so lustful that) you do not get that auspicious sight - that intellect, which wishes you well - by which your life can be protected.॥ 52॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि कीचकवधपर्वणि कीचककृष्णासंवादे चतुर्दशोऽध्याय:॥ १४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत कीचकवधपर्वमें कीचक-द्रौपदी-संवादविषयक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १२ श्लोक मिलाकर कुल ६४ श्लोक हैं।)
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥