vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 4: विराट पर्व
»
अध्याय 14: कीचकका द्रौपदीपर आसक्त हो उससे प्रणययाचना करना और द्रौपदीका उसे फटकारना
»
श्लोक 45
श्लोक
4.14.45
मया दत्तमिदं राज्यं स्वामिन्यसि शुभानने।
भजस्व मां वरारोहे भुङ्क्ष्व भोगाननुत्तमान्॥ ४५॥
अनुवाद
शुभन्ने! मैंने यह सम्पूर्ण राज्य तुम्हें अर्पित कर दिया है। अब तुम इसके स्वामी हो। वररोहे! मुझे स्वीकार करो और मेरे साथ उत्तम सुख भोगो।॥ 45॥
Shubhanne! I have offered this entire kingdom to you. Now you are its owner. Vararohe! Accept me and enjoy the best pleasures with me.'॥ 45॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×