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श्री महाभारत
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पर्व 4: विराट पर्व
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अध्याय 14: कीचकका द्रौपदीपर आसक्त हो उससे प्रणययाचना करना और द्रौपदीका उसे फटकारना
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श्लोक 44
श्लोक
4.14.44
सर्वकामसमृद्धेषु भोगेष्वनुपमेष्विह।
भोक्तव्येषु च कल्याणि कस्माद् दास्ये रता ह्यसि॥ ४४॥
अनुवाद
कल्याणी! जब यहाँ तुम्हें समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले अतुलनीय सुख उपलब्ध हैं, तब तुम दासत्व में क्यों आसक्त हो?॥ 44॥
‘Kalyani! When incomparable pleasures fulfilling all your desires are available to you here, then why are you attached to servitude?॥ 44॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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