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mahabharat 4.14.37: जो पापी मनुष्य मिथ्या वस्तुओं में आसक्त हो जाता है, वह जाल में पड़कर भयंकर अपयश को प्राप्त होता है अथवा उसे महान भय (मृत्यु) का सामना करना पड़ता है। ॥37॥   |   mahabharat अध्याय 4.14: कीचकका द्रौपदीपर आसक्त हो उससे प्रणययाचना करना और द्रौपदीका उसे फटकारना   ।   mahabharat पर्व 4: विराट पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 14: कीचकका द्रौपदीपर आसक्त हो उससे प्रणययाचना करना और द्रौपदीका उसे फटकारना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  4.14.37 
मिथ्याभिगृध्नो हि नर: पापात्मा मोहमास्थित:।
अयश: प्राप्नुयाद् घोरं महद् वा प्राप्नुयाद् भयम्॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
जो पापी मनुष्य मिथ्या वस्तुओं में आसक्त हो जाता है, वह जाल में पड़कर भयंकर अपयश को प्राप्त होता है अथवा उसे महान भय (मृत्यु) का सामना करना पड़ता है। ॥37॥
 
A sinful person who gets attached to false objects, gets a terrible infamy by falling into the trap or has to face a great fear (death). ॥ 37॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)