श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 12: नकुलका विराटके अश्वोंकी देखरेखमें नियुक्त होना  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  4.12.2-3 
स वै हयानैक्षत तांस्ततस्तत:
समीक्षमाणं स ददर्श मत्स्यराट्।
ततोऽब्रवीत् ताननुगान् नरेश्वर:
कुतोऽयमायाति नरोऽमरोपम:॥ २॥
स्वयं हयानीक्षति मामकान् दृढं
ध्रुवं हयज्ञो भविता विचक्षण:।
प्रवेश्यतामेष समीपमाशु मे
विभाति वीरो हि यथामरस्तथा॥ ३॥
 
 
अनुवाद
आते ही वह इधर-उधर घूमकर घोड़ों को देखने लगा। इस प्रकार घोड़ों का निरीक्षण करते समय मत्स्यराज विराट की उस पर दृष्टि पड़ गई। तब राजा ने वहाँ बैठे अपने अनुचरों से कहा, 'पता लगाओ कि यह देवता के समान दिखने वाला पुरुष कहाँ से आ रहा है। यह बिना कहे ही मेरे घोड़ों को बड़े ध्यान से देख रहा है; अतः यह अवश्य ही घोड़ों को पहचानने में निपुण और घुड़सवारी का विद्वान होगा। अतः इसे शीघ्र ही मेरे पास ले आओ। यह वीर पुरुष देवताओं के समान शोभायमान दिख रहा है।'॥ 2-3॥
 
As soon as he arrived, he started looking at the horses by moving around. While inspecting the horses in this manner, the king of Matsyas, Virat, saw him. Then the king said to his followers sitting there, 'Find out where this man who looks like a god is coming from. He is looking at my horses very carefully without being told; hence he must be an expert in recognizing horses and a scholar in horsemanship. Therefore, bring him to me quickly. This brave man is looking as graceful as a god.'॥ 2-3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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